
- परिचय (Introduction)
“सागरिका” संस्कृत जगत् की प्रतिष्ठित त्रैमासिक शोध पत्रिका है, जिसका आरम्भ विक्रम संवत् 2019 (1962 ई.) में हुआ। इसे सागरिका समिति, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा प्रकाशित किया जाता है। पत्रिका संस्कृत भाषा में शोधपत्रों के प्रकाशन के लिए समर्पित है और इसका ISSN 2229-5577 है। सागरिका पत्रिका का उद्देश्य प्रकाशन, समीक्षा, नैतिकता, गुणवत्ता और दृश्यता से संबंधित सभी पहलुओं को स्पष्ट और पारदर्शी रूप से परिभाषित करना है।
संस्कृत की प्राचीन पत्रिकाओं में सागरिका का महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रकाशन सुविधाओं के अभाव और संचारसाधनों की न्यूनता के कारण संस्कृत की पत्रिका का प्रकाशन साहसपूर्ण कार्य था। आरम्भ में इसका मुद्रण वाराणसी या प्रयाग से करवाया जाता था। आरम्भ में यह पत्रिका षाण्मासिक थी जो बाद में त्रैमासिक हो गयी। इसका प्रकाशन भारतीय तिथियों के अनुसार प्रतिवर्ष चैत्र, आषाढ, आश्विन और पौष माह में होता है। आरम्भिक अंकों में पत्रिका में सम्पादकीय, शोधपत्र, काव्य, संस्कृत वृत्त, ग्रन्थ समीक्षा, सागर विश्वविद्यालय में जारी शोधकार्य, स्तम्भ होते थे। वर्तमान में इसमें केवल शोधपत्र एवं ग्रन्थ समीक्षाओं का प्रकाशन होता है। सागरिका का पहला अंक डॉ. वासुदेव विष्णु मिराशी, श्री जीवन्याय तीर्थ, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, श्री मंगलदेव शास्त्री, श्री विश्वनाथ भट्टाचार्य, श्री धीरेन्द्र वर्मा,श्री सत्यव्रत सिंह, कृष्णनम्पूतिरिपाद, श्री कृष्णदत्त वाजपेयी, श्री गणपति शुक्रु, श्री व्रतीन्द्रकुमार सेनगुप्त, श्री रामकिशोर मिश्र, श्री शिवचन्द्र भट्टाचार्य, श्री मंजुलमय कपंतुल, श्री रुद्रदेव त्रिपाठी, श्रीमती वनमाला भवालकर, श्री विश्वनाथ शास्त्री और श्री रामगोपाल मिश्र के लेख, काव्य और संस्कृत वृत्त से समन्वित होकर प्रकाशित हुआ था। पिछली शती के विद्वान् आचार्यों, लेखकों और शोधार्थियों के गंभीर चिन्तनपरक लेख इसकी गरिमा के परिचायक हैं। एक ओर स्थापित विद्वानों को इस पत्रिका में आदर मिला वहीं दूसरी ओर शोधरत छात्रों को भी प्रकाशन का अवसर प्राप्त हुआ। पण्डित वायुनन्दन पाण्डेय, आचार्य अमरनाथ पाण्डेय, पं. गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर, पं. बच्चूलाल अवस्थी, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी जैसे विद्वानों ने अपने लेखन से इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया था। आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का सीताचरितमहाकाव्य प्रथमतः सागरिका में ही प्रकाशित हुआ था। देश के प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों को एक साथ पढ़ना विद्यारसिकों के लिए आनन्ददायक होता है। संस्कृतवाङ्मय के शास्त्रीय विषयों पर इसमें लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जैसे श्री गोपीनाथ कविराज का लेख ‘शाक्तदृष्ट्या सृष्टितत्त्वविमर्शः’। इसमें प्रकाशन हेतु भाषा की अर्हता रही है, वह है संस्कृत। विषयानुकूल होने पर अन्य भाषा में प्रकाशित लेखों को संस्कृत में अनूदित करके भी प्रकाशित किया गया है। विषयानुकूल लेखों का पुनः प्रकाशन भी किया गया है। इसके प्रकाशन की लगभग साठ वर्षों की अवधि में प्रो. रामजी उपाध्याय, डॉ. वनमाला भवालकर, डॉ विश्वनाथ भट्टाचार्य, डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ. रामगोपाल मिश्र, डॉ. मनोरमा त्रिपाठी, प्रो. कुसुम भूरिया ने सम्पादन के दायित्व का निर्वहन किया है। प्रो. अच्युतानन्द दाश कुछ वर्षों तक प्रबन्ध संपादक रहे। काव्यशास्त्र विशेषांक के अतिथि सम्पादक प्रो. रमाकान्त पाण्डेय रहे हैं। इकतालीसवें वर्ष में डॉ. शीतांशु त्रिपाठी संपादन सहायक रहे हैं। उनके पश्चात् संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. नौनिहाल गौतम ने इसके सम्पादन कार्य को सम्भाला है। तदनन्तर विभाग के ही सहायक प्राध्यापक डॉ. शशिकुमार सिंह ने इसका सम्पादन किया है। वर्तमान में विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. किरण आर्या इसका सम्पादन कार्य देख रही हैं। इसके अब तक सोलह विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं जो संग्रहणीय हैं। उनका विवरण इस प्रकार है-
| नाम | प्रकाशित वर्ष |
| राजेन्द्र प्रसाद विशेषांक (महामहिम राष्ट्रपति) | प्रथम वर्ष में |
| भारतीय संस्कृति विशेषांक | द्वितीय वर्ष |
| कालिदास विशेषांक | द्वादश त्रयोदश वर्ष में |
| ज्योतिष विशेषांक | षोडश वर्ष में |
| नाट्यवेद विशेषांक | सप्तदश वर्ष में |
| मध्ययुगीन संस्कृत नाटक विशेषांक | अष्टादश वर्ष में |
| भट्टतौत विशेषांक | बाईसवें वर्ष में |
| रजत जयन्ती विशेषांक | पच्चीस वें वर्ष में |
| प्राचीन भारतीय समाज दर्शन विशेषांक | उनतीसवें वर्ष में |
| मनुस्मृति विशेषांक | तैंतीसवें वर्ष में |
| आधुनिक संस्कृत साहित्य विशेषांक | पैंतीसवें वर्ष में |
| संस्कृत गौरव विशेषांक | छत्तीसवें वर्ष में |
| आधुनिक संस्कृत गद्यकाव्य विशेषांक | सैतीसवें वर्ष में |
| काव्यशास्त्र विशेषांक | उनतालीसवें वर्ष में |
| आचार्यरामजीउपाध्यायस्मृतिविशेषांक | बयालीसवें वर्ष में |
इनके अतिरिक्त अंक 47.1-4 में केवल महाकवि कालिदास से संबंधित शोधपत्र प्रकाशित हैं, इसी प्रकार अंक 48.4 में महाकवि भास व भवभूति पर केन्द्रित शोधपत्र प्रकाशित हैं। अंक 48.1-2 में केवल डॉ. पूर्णचन्द्र उपाध्याय का बृहत् शोधकार्य ‘अर्वाचीनाचार्यराधावल्लभीयसंस्कृतसाहित्ये पर्यावरणचेतना ' प्रकाशित है।
आईएसएसएन युक्त यह पत्रिका यूजीसी एप्रूव्ड जर्नल में सूचीबद्ध रही है। इसमें प्राप्त शोध लेखों को समीक्षा समिति द्वारा चयनित किये जाने पर प्रकाशित किया जाता है और यह प्रकाशन निःशुल्क होता है। आरम्भ से ही शोधपत्र लेखकों को लेखकीय प्रति निःशुल्क दी जाती रही है।
वर्तमान में पत्रिका में मुख्यतः मौलिक शोधपत्र एवं ग्रन्थ समीक्षाओं का प्रकाशन होता है। इसका संपादकीय मंडल विद्वानों और अनुभवी शिक्षाविदों से सम्पन्न है, जिसमेंं संरक्षक सम्पादक पदस्थ कुलपति , संस्थापक संपादक प्रो. रामजी उपाध्याय, प्रधान परामर्शक प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रधान संपादक प्रो. राजेन्द्र यादव और संपादक डॉ. किरण आर्या हैं।
सागरिका ने दशकों से विद्वानों और शोधार्थियों को प्रकाशन का अवसर प्रदान किया है। इसमें आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी, पं. गजानन शास्त्री मुसलगाँवकर, श्री गोपीनाथ कविराज जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों के लेख प्रकाशित हुए हैं। इसके अनेक विशेषांक, जैसे कालिदास, ज्योतिष, नाट्यवेद और आधुनिक संस्कृत साहित्य, शोधार्थियों के लिए संग्रहणीय हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पत्रिका सागरिका संस्कृत पत्रकारिता में एक प्रतिष्ठापूर्ण नाम है। 'सागरिका परामर्शदात्री समिति' द्वारा समय-समय पर यथोचित मार्गदर्शन के माध्यम से इस पत्रिका का प्रकाशन नियमित होता है। इसका सतत प्रकाशन संस्कृत जगत् के लिए गौरव का विषय है। यह सागरिका शोध पत्रिका शोधपत्रों का निःशुल्क प्रकाशन करती है और लेखकों को प्रतिलिपि प्रदान करती है। इसका सतत प्रकाशन संस्कृत पत्रकारिता और शोध जगत् के लिए गौरव का विषय है। “सागरिका” ने संस्कृत साहित्य, विद्वत्ता और अकादमिक उत्कृष्टता के क्षेत्र में अपनी अमिट छवि बनाई है। सागर की यह सागरिका शोधपत्रिका शोधार्थियों के लिए ‘गागर में सागर’ की तरह अत्यन्त उपादेय है।





