- परिचय (Introduction)-

"नाट्यम्" रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र की यूजीसी केयर लिस्टेड पीयर रिव्यूड त्रैमासिक शोध पत्रिका है, जिसका आरम्भ विक्रम संवत् 2049 (1982 ई.) में संस्कृत जगत् के विश्व प्रसिद्ध मनीषी एवं संस्कृत साहित्यकार आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी के द्वारा किया गया था। यह पत्रिका नाट्य परिषद्, संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर मध्यप्रदेश के द्वारा सतत रूप से प्रकाशित की जा रही है। नाट्यम् शोधपत्रिका अपने गुणात्मक एवं ज्ञानात्मक शोधालेखों के कारण विश्वविश्रुति को प्राप्त है। रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र के विविध संदर्भों को युक्तियुक्तपूर्ण रूप से व्याख्यायित करने वाली यह श्रेष्ठ शोध पत्रिका साहित्य मर्मज्ञों के प्रभूत आदर को प्राप्त है। वर्ष में त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होने वाली नाट्यम् शोध पत्रिका का ISSN: 2229-5550 है। नाट्यम् पत्रिका का उद्देश्य रंगमंच एवं सौन्दर्यशास्त्र के मर्मस्पर्शी संदर्भों को उद्घाटित करने वाले गुणवत्तापूर्ण शोधालेखों का प्रकाशन है। जिसमें समीक्षण, विश्लेषण, पल्लवन आदि के साथ-साथ पत्रिका में सम्मिलित शोधालेखों में विद्यमान नैतिकता, गुणवत्ता, मूल्यनिष्ठा, मौलिकता, तार्किकता आदि से संबंधित सभी पहलुओं को स्पष्ट एवं पारदर्शी रूप में परिभाषित करना है। संस्कृत की प्रमुख शोधपत्रिकाओं में नाट्यम् का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सन् 1982 से अद्यावधि निरंतर प्रकाश्यमान नाट्यम् शोधपत्रिका के शताधिक अंक प्रकाशित हो चुके हैं। नाट्यम् शोधपत्रिका के प्रथम अंक मे ४-५वीं शती के सुप्रसिद्ध कवि दिंगनाग द्वारा रचित श्रेष्ठ संस्कृत नाटक ‘कुंदमाला’ का हिन्दी अनुवाद, सन् 1982 में प्रकाशित हुआ था। ‘नाट्यशास्त्र के बीजशब्द’ पर डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी एवं डॉ.कुसुम भूरिया, १४वीं शताब्दी के प्रसिद्ध रचनाकार भास्कर विरचित ‘उन्मत्तराघव’ प्रेक्षणक का हिन्दी अनुवाद पर डॉ. इन्द्रमोहन सिंह के महत्त्वपूर्ण आलेख इस अंक के प्रमुख आकर्षण हैं। सन् 1983 में कावालम नारायण पणिक्कर प्रणीत ‘स्थित है सूर्य’ नाटक, डॉ.विंध्येश्वरी प्रणीत ‘संस्कृत रंग परंपरा से प्रभावित कुछ हिन्दी नाटक’, क्षेत्रवासी पंडा प्रणीत ‘देवीचंद्रगुप्त एवं विशाखदत्त का अनुपलब्ध नाटक’, प्रेम शंकर सिंह प्रणीत ‘मैथली रंगमंच का उद्भव एवं विकास’ आदि शोधालेखों का प्रकाशन हुआ। सन् 1984 में डॉ. कुसुम भूरिया के द्वारा ‘शाकुंतल के अभिनय की कालिदास दर्शित दिशा’, सन् 1985 में निशांत केतु के द्वारा ‘नाट्यशास्त्रीय परिभाषिक शब्दों अर्थच्युति’, बच्चन त्रिवेदी के द्वारा ‘रंगकर्म की सार्थकता’, डॉ. इन्द्रमोहन सिंह के द्वारा ‘प्रबुद्धरोहणीय अभिनेयता’ आदि विषयों पर सारगर्भित शोधालेख प्रकाशित हुए। सन् 1986 में ‘मणिपुरी नट संकीर्तन में पूर्वरंग’- सनक्य एबोटोंबी, ‘भारतीय गीतिनाट्य उद्भव एवं विकास’- डॉ. चंद्रकांत शुक्ल, ‘संस्कृत रंगमंच पर एक नया उपक्रम- वीणावासवदत्ता’- इसरार मोहम्मद खाँ; सन् 1987 में ‘बालीद्वीप की रंगमंचीय परंपरा’- डॉ.राजेन्द्र मिश्र, ‘आधुनिकता बोध और सौन्दर्यशास्त्र’- डॉ. राममूर्ति त्रिपाठी, ‘भवभूति की कविता में मनोराज्य का चित्रण’- डॉ. राजेन्द्र मिश्र, ‘त्रासदी की भारतीय अवधारणा और भवभूति के नाटक’- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी; सन् 1988 में ‘संक्षिप्त नाट्यशास्त्रम्, नाट्यशास्त्र और संस्कृत नाटककार/अभिनय दैहिक भाषा का अनुशासन, भास के पञ्चरात्र की अनुरचना’- राजेन्द्र जोशी; सन् 1989 में ‘विघ्नेशजन्मोदय: एक अपारंपरिक संस्कृत नाटक’- डॉ. मालिनी गोस्वामी, ‘प्रसाद के नाटक: अंतर्वस्तु और शिल्प’- डॉ राधावल्लभ त्रिपाठी; सन्1990 में ‘रंगमंच तथा यज्ञ’- राजकमल नायक; सन् 1992 में ‘नाटक कैसे देखना चाहिए’ अनुवाद- डॉ.आशा सर्वटे, ‘पारंपरिक रंगमंच, समकालिकता, आधुनिकता और भारतीयता’- कमलेशदत्त त्रिपाठी; सन् 1996 में ‘नाट्यशास्त्रीय अभिनय विधान और संस्कृत नाटक’- कमलेशदत्त त्रिपाठी, ‘पूर्वरंग की व्याप्ति और पाठ्ययोग’- राममूर्ति त्रिपाठी; सन् 1997 में ‘समसामयिकता विचारधारा और रंगमंच’- नाग बोडस, ‘नाट्यशास्त्र का लक्षण सिद्धांत’- कुसुम भूरिया; सन् 1998 में ‘लद्दाख के लोकनृत्य’- सुषमा गुप्ता; सन् 1999 में ‘नाट्यशास्त्र संस्कृत नाटक तथा विश्वरंगमंच’- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी, ‘निर्देशक का रंगमंच’- महेश चंपकशाह, सन् 2000 में ‘संस्कृत नाटक और आधुनिक रंगकर्म’ (कुमारी संगीता की हबीब तनवीर से बातचीत), मुझे मौत दी क्यों नाटक- कमल वशिष्ठ, ‘21वीं शताब्दी में नाट्य वास्तु प्रासंगिकता एवं उपादेयता’- डॉ इच्छाराम द्विवेदी, ‘नाट्यम् का स्वर्णजयंती विशेषांक, संस्कृत नाटकों में राम का चरित्र: नई योजनाएं’- देवर्षि कमलनाथशास्त्री, सन् 2001 में ‘नाट्यशास्त्र नवीन पाठ की आवश्यकता’- कमल वशिष्ठ, ‘नई सहस्त्राब्दी में नाट्यशास्त्र’- कमलेशदत्त त्रिपाठी, ‘भारतीय सौन्दर्यशास्त्र: समस्याएं और संभावनाएं’- प्रियदर्शी पटनायक, ‘बौद्धरंगमंच;- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी; सन् 2002 में ‘ऐतरेय महिदास की कलादृष्टि’- डॉ.राधावल्लभ त्रिपाठी, ‘काश्मीर शैवदर्शन की सौन्दर्य दृष्टि’- नवजीवन रस्तोगी, सन् 2003 में ‘रूपक तथा उपरूपक की परंपरा’- श्रीमती ऊर्मि गुप्ता, सन् 2004 में ‘स्वप्नवासदत्तम्-स्नेह के ताने बाने का नाटक’- हर्षदेव माधव; सन् 2005 में ‘महावीरचरित की रामकथा और भवभूति का वैशिष्ट्य’- बनमाली बिश्वाल, ‘नीमड़ का लोकनाट्य गम्मत और संस्कृत नाटक’- डॉ. ओमप्रकाश राजपाली, ‘नेपालीय पाण्डुग्रन्थों में नाट्यशास्त्र के षष्ठ एवं सप्तम अध्यायों के कुछ महत्त्वपूर्ण पाठ : एक प्रयोग परक दृष्टि’- अन्विता शर्मा, ‘संस्कृत साहित्य में नाटिका’- महेश द्विवेदी, ‘समकालीन परिप्रेक्ष्य में नाट्यशास्त्र की प्रासङ्गिकता’- सविता ओझा, ‘बाली में रामायण और महाभारत की प्रयोग परंपरा’- आइ. केतुत सूबगियास्ता, ‘मन्दाकिनी के लोकमानस में महाभारत निहितार्थ’- धर्मानन्द शर्मा, ‘नाट्य प्रयोग में सन्ध्यङ्गों का औचित्य’-कुसुम भूरिया, ‘क्रांति का विचार और संस्कृत नाटक’-सत्येंद्र तनेजा, ‘अभिराज राजेन्द्र मिश्र कृत एकांकी में समकालीन समाज का यथार्थ’- सविता ओझा, ‘नाट्यशास्त्र : भरत के अभिनय सूत्र’- गौतम चटजी, ‘साम्प्रतिक संस्कृत रंग लोक की बिखरी अनुसंधानात्मक प्रवृत्तियाँ’- अजय कुमार मिश्र, ‘ब्रज की रास लीला का सौन्दर्य चिन्तन’-अभिराज राजेन्द्र मिश्र, ‘संस्कृत-नाटक पर ग्रीक प्रभाव की अवधारणा’- डॉ. स्मिता अग्रवाल, ‘भरत का नाट्य-शास्त्र और पारंपरिक भारतीय रंगमंच : भारतीय रंगमंच की पहचान का प्रश्न तथा समकालीन रंगमंच पर नाट्यशास्त्रीय परंपरा का प्रभाव’- कमलेश दत्त त्रिपाठी, ‘अंग्रेजी से हिन्दी अनु’.- हिमांशु शेखर झा, ‘सङ्गीतशास्त्र की परंपरा’- डॉ. संजय द्विवेदी, ‘दूतवाक्यम् में प्रयुक्त चित्रपट दुर्योधन की मानसिकता का सटीक चित्रण’- डॉ. महेश चम्पकलाल, ‘संस्कृत-प्राकृत-रूपकों एवं उपरूपकों की वर्तमान रङ्गमञ्चीय स्थिति’- सुमनकुमार झा, ‘कथा श्रीराधा की’ राधावल्लभ त्रिपाठी (नाट्यत्रयी का अनुवाद : कौशल तिवारी), ‘नाट्यशास्त्र विशेषांक’-2017, ‘नाट्य-शास्त्र के विकास में नाट्य दर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र का योगदान’- संगीता मेहता, ‘हर्ष के रूपकों की भाषा शैली एवं अभिनेयता’-गोकुलप्रसाद त्रिपाठी, ‘कूटनीति के निकष पर मुद्राराक्षस’- सज्जय कुमार 2018, ‘संस्कृत नाटकों में मुख्यधारा से इतर पात्रों का चारित्रिक विश्लेषण’- सरोज कौशल, ‘विशाखदत्त विशेषाङ्क’-2019, ‘रामजी उपाध्याय का नाट्य साहित्य’- 2020 ।





